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फसल उत्पादन एवं प्रबंध                           (Crop Production and Management)

  • कृषि पद्धतियाँ :- लगभग 10,000 ई.पू पहले हिम युग का अंत हुआ। बढ़ती हुई जनसंख्या को भोजन प्रदान करने के लिए हमें विश्ष्टि कृषि पद्धतियों को अपनाया होता है।
  • फसल :- जब एक ही किस्म के पौधे किसी स्थान पर बड़े पैमाने पर उगाए जाते हैं , तो इसे फसल कहते हैं। 

जैसे – अन्न , सब्जियाँ एवं फल ।

  • यहाँ ताप , आर्द्रता , और वर्षा एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में भिन्न है।
  • फसल के प्रकार :- फसल को दो वर्गों में बँटा जा सकता है।
  • खरीफ़ फ़सल :- वह फसल जिन्हें वर्षा ऋतु में बोया जाता है, खरीफ़ फ़सल कहलाती है।  भारत में वर्षा ऋतु जून से सितम्बर तक होती है।  धान , मक्का , सोयाबीन , मूँगफली आदि
  • रबी फ़सल :- वह फसल जिन्हें शीत ऋतु में बोया जाता है। भारत में शीत ऋतु अक्टूबर से मार्च तक होती है।

जैसे – गेंहूँ , चना , मटर , सरसों आदि।

  • कृषि पद्धतियाँ :- फसल उगाने के लिए किसान को अनेक क्रियाकलाप सामयिक अवधि 

में करने पड़ते हैं।

1. मिट्टी तैयार करना।

2. बुआई

3. खाद एवं उवर्रक देना

4. सिंचाई

5. खरपतवार से सुरक्षा

6.कटाई

7. भंडारण

  • जुताई :- मिट्टी को उलटने-पलटने की प्रक्रिया जुताई कहलाती है।
  • हल :- प्रचीन काल जुताई के लिए हल का प्रयोग किया जाता था।
  • कुदाली :- जिसका उपयोग खरपतवार निकालने के लिए किया जाता है।
  • कल्टीवेटर :- आजकल जुताई ट्रैक्टर द्वारा संचालित कल्टीवेटर से की जाती है।
  • बुआई :- बुआई फसल उत्पादन का सबसे महत्वपूर्ण चरण है।
  • परम्परागत औज़ार :- ये सिरे मिट्टी को भेदकर बीज को स्थापित कर देते हैं।
  • सीड-ड्रिल :- आजकल बुआई के लिए द्वारा संचालित सीड-ड्रिल का उपयोग होता है।
  • खाद एवं उवर्रक मिलाना :- मिट्टी में पोषक स्तर बनाए रखने खाद एवं उवर्रक मिलाया जाता है।

कम्पोस्टिंग :- रसोई घर के अपशिष्ट सहित पौधों एवं जंतु अपशिष्टों को खाद में परिवर्तित करना कम्पोस्टिंग कहलाता है।

  • वर्मीकम्पोस्टिंग :- रसोइ घर के कचरे को कृमी अथवा लाल केंचुओं द्वारा कंपोस्ट में परिवर्तित करना वर्मीकम्पोस्टिंग कहलाता हैं।
  • सिंचाई :- निश्चित अंतराल पर खेत में जल देना ।
  • सिंचाई के स्रोत :- कुऍं , तालाब , नदियाँ , बाँध आदि।
  • आधुनिक विधियाँ :– छिड़काव , ड्रिप तंत्र आदि
  • खरपतवार से सुरक्षा :- खेत में कई अन्य अवांछित पौधों को खरपतवार कहते है।
  • निराई :- खरपतवार को हटाने को निराई कहते है।
  • रसायन :- खरपतवार पर नियंत्रण के लिए उपयोग किया जाता है।
  • कटाई :- फसल पक जाने के बाद उसे काटना कटाई कहलाता है।
  • हार्वेस्टर :- फसल की हाथ या मशीन से कटाई की जाती हैं।
  • थ्रेशिंग :- काटी गई फसल से बीजों को भूसे से अलग करना होता है।
  • भंडारण :- उत्पाद का भंडारण एक महत्वपूर्ण कार्य है।
  • बीजों को पीड़कों एवं सूक्ष्मजीवों से संरक्षित करने के लिए उचित भण्डारण आवश्यक है।

  अध्याय 2 : सूक्ष्मजीव : मित्र और शत्रु           (Microorganisms: Friend and Foe)

  • सूक्ष्मजीव :- वे जीव जिन्हें मनुष्य नंगी आंखों से नही देख सकता तथा जिन्हें देखने के लिए सूक्ष्मदर्शी यंत्र की आवश्यकता पड़ती है, उन्हें सूक्ष्मजीव कहते हैं। सूक्ष्मजीव सर्वव्यापी होते हैं। यह मृदा, जल, वायु, तथा प्राणियों तथा पादपों में पाए जाते हैं।
  • सूक्ष्मजीवों को चार मुख्य वर्गों में बांटा गया है –
  • जीवाणु :- ये अत्यंत छोटे सूक्ष्म जीव है , जिन्हें बैक्टरिया भी कहा जाता है। ये सामान्यतः एक कोशिकीय भित्ति होते है। ये जल , हवा , मिट्टी , नमीयुक्त जगह पर पाए जाते है।
  • दूध से दही बनाना।
  • खाद उवर्रक में सहायता करते है।
  • मनुष्य में निमोनिया , हैजा , टी.बी रोग फैलते है।
  • कवक :- कवकों को सामान्य बोलचाल की भाषा में फफूंदी कहते हैं। ये चमड़े , भोजन , आचार में उग जाते है। कवकों के तंतु एककोशिक या बहुकोशिकीय होते है। कवक सड़े गले जीव-जंतु , पौधों को खाकर खनिज में बदल देते है।
  • पेनिसिलिन , स्ट्रेमाइसिन जैसी औषधीय कवकों से निर्मित होते है।
  • ये पौधों , जंतुओं , मनुष्यों में (दाद , खुजली ) फैलते है।
  • प्रोटोजोआ :- सूक्ष्मजीव का समूह होता है । ये मिट्टी , जल , पौधों और जानवरों के शरीर में उपस्थित होते है। ये एक कोशिकीय जीव होते है। समुदाय के जीव मनुष्यों में रोग फैलते है।
  • उदाहरण – मलेरिया , पेचिस , निद्रा रोग आदि।
  • शैवाल :- ये रुके हुए पानी मे उगती है और फिसलन बनाती है। ये एक कोशिकीय तथा बहुकोशिकीय का समूह होता है। इन शैवालों का रंग नीला होता है। जैविक खाद के निर्माण में सहायता करते है।
  • जल को प्रदूषित करते हैं।
  • विषाणु :- ये सूक्ष्म जीवों से भिन्न होते है, ये केवल परपोषी में ही गुणन करते है।
  • उदाहरण – खाँसी , जुकाम , फ्लू , पोलियो , खसरा रोग फैलते है।
  • सूक्ष्मजीवों के उपयोग :-

1. दूध से दही बनना- दूध से दही बनाने के लिए हम दूध में थोड़ा सा दही मिलाते हैं जिसमें लैक्टोबैसिलस नामक जीवाणु पाए जाते हैं जो संपूर्ण दूध को दही में परिवर्तित कर देते हैं|

इसके अलावा सूक्ष्मजीव ब्रेड, केक, पनीर, अचार आदि खाद्य पदार्थों के उत्पादन में सहायक होते हैं|

2. एल्कोहल निर्माण – एल्कोहल के उत्पादन में भी सूक्ष्मजीवों का उपयोग किया जाता है | शर्करा में यीस्ट द्वारा एल्कोहल एवं शराब का उत्पादन किया जाता है| चीनी के एल्कोहल में परिवर्तन की प्रक्रिया को किण्वन कहा जाता है|

3. औषधीय उपयोग– जब भी हम बीमार होते हैं तो डॉक्टर हमें प्रतिजैविक ( एंटीबायोटिक) की गोली देते हैं| इन औषधियों का स्त्रोत सूक्ष्मजीव ही होते हैं| यह औषधिया हमारे शरीर में बीमारी पैदा करने वाले सूक्ष्मजीवों को नष्ट कर देती है या उनकी वृद्धि को रोक देती है|

4. इसके अलावा सूक्ष्मजीवों की सहायता से कई बीमारियों को रोकने के लिए वैक्सीन (टीका) भी बनाए जाते हैं |

  • पेनिसिलिन :- बीमार पड़ने पर डॉक्टर आपको पेनिसिलिन का इंजेक्शन देते है। 1929 में अलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने फफूँद से ‘ पेनिसिलिन ‘ बनाई गई।
  • वैक्सीन (टिका) :- सूक्ष्मजीव हमारे शरीर में प्रवेश करते है तो उनसे लड़ने के लिए वैक्सीन (टिका) लगाया जाता है।
  • जब एक बच्चे को जन्म के पहले वर्ष में बी.सी. जी. का एक टीका, डी.पी.टी. के तीन टीके, हेपेटाइटिस ‘बी’ के तीन टीके, पोलियो की तीन खुराक और खसरे का एक टीका लग गया हो, तब बच्चे का टीकाकरण पूर्ण माना जाता है।
  •  राष्‍ट्रीय टीकाकरण सूची :-

1. खसरा 

2. टेटनस (धनुष बाय)  

3. पोलियो 

4. क्षय रोग  

5. गलघोंटू 

6. काली खांसी 

7. हेपेटाईटिस

  •  मिट्टी की उर्वरता में वृद्धि :- कुछ जीवाणु एवं नीले-हरे शैवाल वायुमण्डलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर सकते है।
  • पर्यावरण का शुद्धिकरण :- सूक्ष्मजीवों का उपयोग करके पर्यावरण का शुद्धिकरण कर सकते है।
  • मनुष्य में रोगकारक सूक्ष्मजीव :- सूक्ष्मजीव श्वास द्वारा , पेय जल एवं भोजन द्वारा हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं।
  • उदाहरण – हैजा , सर्दी-जुकाम , चिकनपॉक्स एवं क्षय रोग ।
  • जंतुओं में रोगकारक जीवाणु :- अनेक सूक्ष्मजीव जंतुओं में भी रोग उत्पन्न करते है।
  • एंथ्रेक्स मनुष्य एवं मवेशियों में भयानक रोग है।
  • पौधों में रोगकारक जीवाणु :- कुछ सूक्ष्मजीव पौधों में उत्पन्न करते है।
  • रसायनों का प्रयोग करके इन सूक्ष्मजीव पर नियंत्रण पाया जा सकता है।
  • खाद्य परिरक्षण :- परिरक्षक ,नमक एवं खाद्य तेल का उपयोग सूक्ष्मजीवों की वृद्धि को रोकते हैं। सोडियम बेंजोएट तथा सोडियम मेटाबाइल्फइट सामान्य परिरक्षक है। 
  • नमक द्वारा परिरक्षण :- मांस , मलीछ , आम , आँवला , एवं इमली आदि।
  • तेल एवं सिरके द्वारा परिरक्षण :- अचार को संदूषण से बचाने में किया जाता है।
  • गर्म एवं ठंडा करना :- दूध को को उबालने पर अनेक सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते है।
  • नाइट्रोजन स्थिरीकरण :- राइजोबियम जीवाणु पौधों (दलहन) में नाइट्रोजन स्थिरीकरण में सहायक होते है।
  • नाइट्रोजन चक्र :- नाइट्रोजन सभी सजीवों का आवश्यक संघटक है।
  • जो प्रोटीन पर्णहरित (क्लोरोफिल) न्यूकिल्क एसिड एवं विटामिन में उपस्थित होता है।

विशेष जीवाणु , मिट्टी में उपस्थित नाइट्रोजन यौगिकों को नाइट्रोजन गैस में परिवर्तित कर देते हैं जिसका निर्मोचन वायुमण्डल में होता है।

             अध्याय 3 : संश्लेषित रेशे और प्लास्टिक

  • प्राकृतिक रेशे :- कपास , ऊन , रेशम , रेशम आदि पौधों अथवा जंतुओं से प्राप्त से प्राप्त होते है।

            संश्लेषित रेशे मनुष्यों द्वारा बनाए जाते है , इसलिए ये संश्लेषित अथवा मानव निर्मित रेशे 

            कहलाते है।

  •  संश्लेषित रेशे :- एक संश्लेषित रेशा भी छोटी इकाइयों को जोड़कर बनायी गयी एक श्रंखला है।
  • अनेक छोटी इकाइयाँ मिलकर एक बड़ी एकल इकाई बनाते हैं जो बहुलक (अंग्रेजी में पॉलीमर) कहलाती हैं।
  • संश्लेषित रेशो के प्रकार :- रेशम किट से प्राप्त किया जाता है । इसकी खोज चीन में हुई थी। रेशम से प्राप्त कपड़ा बहुत महँगा होता है।
  • रेयॉन :- रेशा काष्ठ लुगदी के रासायनिक उपचार से प्राप्त किया जाता है , जिसे रेयॉन कहते है। रेयॉन को कपास के साथ मिलकर बिस्तर की चादरें बनाते है। ऊन के साथ मिलाकर कालीन बनाते है।
  • नाइलॉन :- मानव-निर्मित रेशा है। इसका निर्माण कोयले , जल और वायु से किया जाता है। नाइलॉन रेशा इतना प्रबल है कि हम इससे नाइलॉन पैराशूट और चट्टानों पर चढ़ने हेतु रस्से बना सकते है।
  •  उदाहरण – जुराबें , रस्से , तम्बू , ब्रुश ,  आदि।
  • पॉलिएस्टर :- पॉली+एस्टर वास्तव में एक रसायन जो एस्टर कहलाता है।
  • बोतलें , बर्तन , फ़िल्म , तार आदि पॉलिस्टर से निर्मित होते है।
  • ऐक्रिलिक :- अन्य संश्लेषित रेशे से तैयार किये जाते है। ये प्राकृतिक रेशों की अपेक्षा अधिक लोकप्रिय हैं।
  •  संश्लेषित रेशों के गुणधर्म :- सभी संश्लेषित रेशे पेट्रोलियम मूल के कच्चे माल जो पेट्रोरसायन कहलाते है। ये शीघ्र सूखते हैं , अधिक चलाऊ , कम महँगे , आसानी से उपलब्ध और रख-रखाव में सुविधाजनक हैं।
  •  प्लास्टिक :- संश्लेषित रेशे की तरह प्लास्टिक भी एक बहुलक हैं। पॉलीथिन (पॉली+एथीन) थैलियाँ बनाने के काम आती हैं।
  • थर्मोप्लास्टिक :- प्लास्टिक जो गर्म करने पर आसानी से विकृत हो जाता है और सरलतापूर्वक मुड़ जाता हैं।
  •  उदाहरण :- पॉलीथिन और पीवीसी, खिलौने , कंघियाँ बनाई जाती है।
  • थर्मोसेटिंग प्लास्टिक :- कुछ प्लास्टिक ऐसे हैं जिन्हें एक बार साँचे में ढाल दिया जाता है तो इन्हें उष्मा देकर नर्म नही किया जा सकता।
  • उदाहरण – बैकेलाइट और मेलामाइन ।
  • बैकेलाइट :- उष्मा और विधुत का कुचालक है। यह बिजली के स्विच , विभिन्न बर्तनों के हत्थे आदि बनाने में काम आता है।
  • मेलामाइन :- यह आग का प्रतिरोधक है। यह फर्श की टाईलें , रसोई के बर्तन और कपड़ें बनाने के लिए उपयोग में लिया जाता है।
  • विकल्प पदार्थ – प्लास्टिक :- धातुओं की अपेक्षा हल्के होने के कारण प्लास्टिक का उपयोग कारों , वायुयानों , अंतरिक्षयानों में भी होता हैं।
  1.  प्लास्टिक कुचालक है।
  2.  प्लास्टिक अभिक्रियाशील है।
  3.  प्लास्टिक हल्का , प्रबल , और चिरस्थायी है।
  • प्लास्टिक और पर्यावरण –
  • जैव निम्निकरणीय :- जो जीवाणु की क्रिया द्वारा अपघटित हो जाते है।
  • जैव अनिम्निकरणीय :- जो सरल से विघटित नही होते है।
  • पुनः चक्रण 5 R सिद्धांत –
  1.  Reduce – उपयोग कम करिए
  2.  Reuse – पुनः उपयोग करिए
  3.  Recycle – पुनः चक्रित करिए
  4.  Recover – पुनः प्राप्त करिए
  5.  Refuse – उपयोग ना करना

        अध्याय 4 पदार्थ : धातु और अधातु                                (Materials : Metals and Non-metals)

  • धातु और अधातु किसे कहते हैं ! धातु-अधातु में क्या अंतर है। धातुओं और अधातुओं के भौतिक गुण और रासायनिक गुण।
  •  धातु तथा अधातु के उपयोग। आप लोहा , ऐलुमिनियम , ताँबा , आदि जैसे कुछ पदार्थों से परिचित हैं।
  • धातु किसे कहते हैं :- वे तत्त्व जो आसानी से धनायन बनाते हैं और अन्य धातु के परमाणु के साथ क्रिया करके धात्विक बन्ध बनाते हैं ‘धातु’ कहलाते हैं.

1.धातु चमकीली तथा ताप और विद्युत् की सुचालक होती है.

2.इनको तार के रूप में खिंचा जा सकता है अर्थात ये तन्य होती हैं.

3.धातुओं में अघात वर्धनियता ( Malleability) का गुण पाया जाता है.

  • उदाहरण- सोना (Au), चांदी (Ag), तांबा (Cu), लोहा (Fe), सोडियम (Na), पोटैशियम (K), इत्यादि.

            पारा सामान्य ताप पर द्रव अवस्था में पाई जाने वाली धातु है.

  • अधातु किसे कहते हैं :- ऐसा तत्व जो चमकीला और अघातवर्ध्य नहीं होता तथा ताप और विद्युत् का कुचालक होता है ‘अधातु’ कहलाता है.
  • उदाहरण- हाइड्रोजन (H2), ऑक्सीजन (O2), आयोडीन (I2), कार्बन (C), इत्यादि सभी अधातु हैं
धातु और अधातु में अंतर Difference between Metal and Non-Metal.
  • धातु और अधातु में निम्न अंतर है.

1. धातुओं की अवस्था ठोस होती है. अधातुएँ ठोस/द्रव/ गैस तीनों अवस्थाओं मे होती है.

2. धातुएँ अम्लों से अभिक्रिया करके हाइड्रोजन गैस पुन: स्थापित करती है. जबकि अधातुएँ अम्लों मे से हाइड्रोजन गैस को पुनः स्थापित नही करती है.

3. धातुएँ सामान्यत: ऊष्मा एवं विद्युत की सुचालक होती हैं. अधातुएँ विद्युत की कुचालक होती हैं.

4. धातुएं क्षारीय ऑक्साइड बनाती है. अधातुएँ अम्लीय अथवा उदासीन ऑक्साइड बनाती हैं.

  • धातुओं और अधातुओं के भौतिक गुण :-
  • धातुओं के गुण जिसके कारण उन्हें पीटकर शीट में परिवर्तित किया जा सकता है , आघातवर्धनीयता कहलाता है।
  • धातुओं का वह गुण जिससे उन्हें खींचकर तारों में परिवर्तित किया जा सकता है , तन्यता कहलाता है।
  • धातुओं से बनी वस्तुओं को जब कठोर सतह से टकराया जाता है तो निनाद ध्वनि (Ringing Sound) उत्पन्न होता है।
  • धातु गायन ध्वनियाँ उत्पन्न करते हैं, अतः वे ध्वनिक कहलाते हैं।
  • धातु कठोर , चमकीले , आघातवर्ध , तन्य , ध्वानिक और उष्मा तथा विधुत के सुचालक होते हैं।
  •  उदाहरण – आयरन , कॉपर , ऐलुमिनियम , कैल्शियम , मैग्नीशियम इत्यादि।
  • अधातुओं के गुण :- ये हथौड़े की हल्की चोट से टूटकर चूर हो जाते है। ये ध्वानिक नही होते हैं। ये उष्मा तथा विधुत के कुचालक हैं।
  • उदाहरण – सल्फ़र , कार्बन , ऑक्सीजन , फॉस्फोरस इत्यादि।
                    धातुओं और अधातुओं के रासायनिक गुण 
  • ऑक्सीजन से अभिक्रिया :-
  • धातु ऑक्सीजन से अभिक्रिया कर धातु ऑक्साइड बनाते हैं जो क्षारीय प्रकृति के होते हैं।
  • अधातु , ऑक्सीजन में अभिक्रिया कर अधातु ऑक्साइड बनाते हैं जो अम्लीय प्रकृति होते है।
  • जल के साथ अभिक्रिया :-
  1.  धातु , जल से अभिक्रिया कर धातु हाइड्रॉक्साइड और हाइड्रोजन गैस उत्पन्न करते हैं।
  2.  आयरन जल से अभिक्रिया करता है।
  3.  अधातु जल से अभिक्रिया नही करते हैं।
  4.  फॉस्फोरस एक बहुत सक्रिय अधातु है।
  •  अम्लों से अभिक्रिया :-
  1.  धातु लवण तथा हाइड्रोजन गैस बनाते हैं।
  2.  अधातु अम्लों से अभिक्रिया नही करते हैं।
  • कुछ धातु क्षारों से अभिक्रिया कर हाईड्रोजन गैस देते हैं।
  • धातुओं और अधातुओं के उपयोग :- आज भी प्रौद्योगिकी में प्रगति और बहुत सी अन्य चीजों के साथ धातुओं का उपयोग बहुत व्यापक हो गया है। धातुएँ भी अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
  •  धातु का उपयोग :-

1. धातु का उपयोग कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री में

2. धातु का उपयोग इलेक्ट्रॉनिक्स में

3. धातु का उपयोग चिकित्सा में

4. धातु का उपयोग मशीनरी, और ऑटोमोबाइल में

5. धातु का उपयोग सजावटी उत्पादों में

  •  अधातु का उपयोग :-

1. हमारे दैनिक जीवन में अधातुओं का उपयोग

2. उर्वरकों में उपयोग किए जाने वाले अधातु

3. पटाखे में उपयोग किए जाने वाले अधातु

4. जल शुद्धिकरण प्रक्रम में किया जाता है।

5. बैंगनी रंग का विलयन एंटीबायोटिक के रूप में घावों पर लगाया जाता है।

  •  धातुओं और अधातुओं का दैनिक जीवन में व्यापक उपयोग होता है।

       अध्याय 5 : कोयला और पेट्रोलियम                                        (Coal and Petroleum)

  •  कोयला और पेट्रोलियम क्या है। कोयला एवं पेट्रोलियम कैसे बनता है। प्राकृतिक संसाधन कोयला , पेट्रोलियम , प्राकृतिक गैस के उपयोग।
  • प्राकृतिक गैस – (जिसे जीवाश्म गैस भी कहा जाता है। प्राकृतिक गैस का निर्माण तब होता है जब लाखों वर्षों में पृथ्वी की सतह के नीचे पौधों और जानवरों के पदार्थ की परतें तीव्र गर्मी और दबाव के संपर्क में आती हैं। पौधों को मूल रूप से सूर्य से जो ऊर्जा प्राप्त होती है, वह गैस में रासायनिक बंधों के रूप में संग्रहित होती है। प्राकृतिक गैस एक जीवाश्म ईंधन है
  • प्राकृतिक संसाधन :- प्राकृतिक संसाधन वे संसाधन हैं जो मानव जाति के कार्यों के बिना मौजूद हैं। ये संसाधन प्रकृति में असीमित मात्रा में उपस्थित है।  मानवीय क्रियाकलापों से समाप्त होने वाला नही हैं।
  • उदाहरण :- पृथ्वी में सूर्य के प्रकाश, वायुमंडल में वायु।
  • समाप्त होने वाले प्राकृतिक संसाधन :-
  1.  प्रकृति में इन स्त्रोतों की मात्रा सीमित है।
  2. ये मानवीय क्रियाकलापों द्वारा समाप्त हो सकते है।
  • उदाहरण :- वन , वन्यजीव , खनिज , कोयला , पेट्रोलियम , प्राकृतिक गैस , आदि।
  • जीवाश्म ईंधन :- इनका निर्माण सजीव प्राणियों के मृत अवशेषों (जीवाश्मों) से होता है ,जिन्हें जीवाश्म ईंधन कहते हैं।
  • कोयले की कहानी :- लगभग 300 मिलियन वर्ष पूर्व पृथ्वी पर निचले जलीय क्षेत्रों में घने वन थे। बाढ़ जैसे प्राकृतिक प्रक्रमों के कारण , ये वन मृदा के नीचे दब गए।
  •  उनके ऊपर अधिक मृदा जम जाने के कारण वे संपीडित हो गए । जैसे-जैसे ये गहरे होते गए उनका ताप भी बढ़ता गया।
  • कोयला :- उच्च दाब और उच्च ताप पर पृथ्वी के भीतर मृत पेड़-पौधे धीरे-धीरे कोयले में परिवर्तित हो गए। कोयले में मुख्य रूप से कार्बन होता है। मृत वनस्पति के , धीमे प्रक्रम द्वारा कोयले में परिवर्तन को कार्बनीकरण कहते हैं।  यह वनस्पति के अवशेषों से बना है अतः कोयले को जीवाश्म ईंधन भी कहते है।
  • कोक :- यह एक कठोर , सरंध्र और काला पदार्थ है।Vयह कार्बन का लगभग शुद्ध रूप है। कोक बहुत से धातुओं के निष्कर्षण में किया जाता है।
  • कोलतार :- यह एक अप्रिय गंध वाला काला गाढ़ा द्रव होता है।
  1. यह लगभग 200 पदार्थों का मिश्रण होता है।
  2. कोलतार का उपयोग औद्योगिक तथा उद्योगों के निर्माण में होता हैं।
  3. आजकल पक्की सड़को के निर्माण में कोलतार के स्थान पर एक पेट्रोलियम उत्पाद बिटुमेन का प्रयोग किया जाता है।
  • कोयला-गैस :- कोयले के प्रक्रमण द्वारा कोक बनाते समय कोयला-गैस प्राप्त होती है।
  1.  यह कोयला प्रक्रमण संयंत्रों के निकट स्थापित किए जाते है
  2.  बहुत से उद्योगों में ईंधन के रूप में उपयोग की जाती हैं।
  3. इसका उपयोग रोशनी के बजाय उष्मा के स्त्रोत के रूप में किया जाता है।
  • पेट्रोलियम :- ये ईंधन प्राकृतिक स्त्रोत से प्राप्त होते हैं जिसे पेट्रोलियम कहते है।
  • पेट्रोलियम शब्द की उत्पत्ति पेट्रा (चट्टान) एवं ओलियम (तेल) से हुई है ।
  • पेट्रोल का उपयोग हल्के स्वचालित वाहनों जैसे- मोटरसाइकिल , स्कूटर , और कारों में होता है।
  • पेट्रोलियम का निर्माण :- समुद्र में रहने वाले जीवों से हुआ। जब ये जीव मृत हुए, इनके शरीर समुद्र के पेंदे में जाकर जम गए और फिर रेत तथा मिट्टी की तहों द्वारा ढक गए। लाखों वर्षों में, वायु की अनुपस्थिति, उच्च ताप और उच्च दाब ने मृत जीवों को पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस में परिवर्तित कर दिया।
  •  पेट्रोलियम तेल और गैस की परत , जल की परत के ऊपर होता है।
  •  तेल और गैस जल से हल्के होते है और इसमें मिश्रित नही होते।
  • पेट्रोलियम का परिष्करण :- पेट्रोलियम गहरे रंग के तेलीय द्रव है। इसमें विभिन्न संघटकों जैसे – पेट्रोलियम गैस , पेट्रोल , डीजल , स्नेहक तेल , पैराफिन मोम आदि का मिश्रण होता है।

            पेट्रोलियम के विभिन्न संघटकों को पृथक करने का प्रक्रम परिष्करण कहलाता है।

  • प्राकृतिक गैस :- प्राकृतिक गैस जीवाश्म ईंधन है , क्योंकि इसका परिवहन पाइपों द्वारा सरलतापूर्वक हो जाता है।
  • प्राकृतिक गैस को उच्च दाब पर संपीडित प्राकृतिक गैस (CNG) के रूप में भंडारित किया जाता है।
  • इसका उपयोग परिवहन वाहनों में ईंधन के रूप में किया जा रहा है।
  • यह कम प्रदूषणकारी है। यह एक स्वच्छ ईंधन है।
  • त्रिपुरा , राजस्थान, महाराष्ट्र , और कृष्णा गोदावरी डेल्टा में पाई जाती है।
  • भारत में पेट्रोलियम संरक्षण अनुसंधान संघ (PCRA) :-
  1. जहाँ तक संम्भव हो गाड़ी समान और मध्यम गति से चलाइए।
  2. यातयात लाइटों पर अथवा जहाँ आपको प्रतीक्षा करनी हो , गाड़ी का इंजन बंद कर दीजिए।
  3. टायरों का दाब और गाड़ी को नियमित रख-रखाव सुनिश्चित कीजिए।

 अध्याय 6 : दहन और ज्वाला                          (Combustion and Flame)

  • दहन क्या है? दहन के प्रकार । ज्वाला क्या है । ईंधन क्या है ? ईंधन के प्ररूप। अम्लीय वर्षा और ग्लोबल वार्मिंग के कारण।

हम घर पर , उद्योगों में और वाहनों को चलाने के लिए विभिन्न प्रकार के ईंधन का उपयोग विविध प्रयोजन  के लिए करते हैं।

  • दहन क्या है :- रासायनिक प्रक्रम जिसमें पदार्थ ऑक्सीजन से अभिक्रिया कर उष्मा देता है , जिसे दहन कहते हैं।
  • जिस पदार्थ का दहन , वह ईंधन कहलाता है। ईंधन ठोस , द्रव या गैस हो सकता है।
  • दहन के समय ज्वाला के रूप में अथवा एक लौ के रूप में प्रकाश उत्पन्न होता है।
  • मैग्नीशियम जलकर मैग्नीशियम ऑक्साइड बनाता है। उष्मा तथा प्रकाश उत्पन्न करता है।
  • काष्ठ-कोयला वायु में जलकर कार्बन डाइऑक्साइड बनाता है। उष्मा और प्रकाश देता है।
  • जब किसी व्यक्ति के वस्त्र आग पकड़ लेते है तो आग बुझाने के लिए व्यक्ति को कम्बल से ढक देते है।
  • ज्वलन-ताप :- वह न्यूनतम ताप जिस पर कोई पदार्थ जलने लगता है , उसका ज्वलन-ताप कहलाता है।
  • आजकल निरापद माचिस के सिरे पर केवल ऐन्टीमनी ट्राइसल्फाइड और पोटैशियम क्लोरेट लगा रहता है। कुछ लाल फॉस्फोरस , श्वेत फॉस्फोरस में परिवर्तित हो जाता है।
  • ज्वलनशील पदार्थ :- जो पदार्थ ज्वाला के साथ सरलतापूर्वक आग पकड़ लेते हैं, ज्वलनशील पदार्थ कहलाते हैं।

           उदाहरण :- पेट्रोल , ऐल्कोहल , द्रवित पेट्रोलियम गैस (LPG) आदि।

  • आग पर नियंत्रण :- जलवाष्प , ज्वलनशील पदार्थ को घेर लेता है जिससे वायु की आपूर्ति बंद हो जाती है और आग बुझ जाती है।
  • जल सबसे अधिक प्रचलित अग्निशामक है। जल लकड़ी और कागज़ पर लगी आग को ही बुझा सकती है।
  • विद्युत उपकरण और पेट्रोल जैसे ज्वलनशील पदार्थों में लगी आग के लिए कार्बन डाइऑक्साइड सबसे अच्छा अग्निशामक है।
  • दहन के प्रकार :-
  • तीव्र दहन :- गैस तेजी से जलने लगती है तथा उष्मा और प्रकाश उत्पन्न करती है।
  • स्वतः दहन :- पदार्थ बिना किसी प्रत्यक्ष कारण के अचानक लपटों के साथ जल उठता है।
  •  फॉस्फोरस जैसे पदार्थ कमरे के ताप पर वायु में जल उठते हैं।
  •  जंगल के स्वतः अग्निकाण्ड कभी अधिक गर्मी के कारण होते हैं।
  • विस्फोट :- जब पटाखे को जलाते हैं तो एक आकस्मिक होने से उष्मा , प्रकाश और ध्वनि पैदा होती है।
  • ज्वाला :- दहन के समय जो पदार्थ वाष्पित होते हैं वे ज्वाला कहलाते हैं।
  • उदाहरण :- पिघली हुई मोमबत्ती के साथ-साथ ऊपर उठते हैं और दहन के समय वाष्पित होकर ज्वाला का निर्माण करते हैं।
  • सोने और चाँदी को पिघलाने के लिए सुनार घातु फुकनी से ज्वाला के सबसे बाहरी भाग को उस पर फूँकते हैं।
  • ईंधन क्या है :- घरेलू और औद्योगिक उपयोगों से संबंधित उष्मा के प्रमुख स्रोत लकड़ी , काष्ठ-कोयला , पेट्रोल , मिट्टी का तेल ।
  • जो ईंधन सहज उपलब्ध हो जाता है। यह सस्ता होता है और वायु में सामान्य दर से सुगमतापूर्वक जलता है।
  • ईंधन दक्षता :- किसी ईंधन के 1 किलोग्राम के पूर्ण दहन से प्राप्त उष्मा ऊर्जा की मात्रा, उसका उष्मीय मान कहलाती हैं।
  • ईंधन के उष्मीय मान को किलोजूल प्रति किलोग्राम (kj/kg) मात्रक द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।
  • अम्लीय वर्षा :- पेट्रोल इंजन नाइट्रोजन के गैसीय ऑक्साइड वर्षा जल में घुल जाते तथा अम्ल बनाते हैं , जिससें अम्लीय वर्षा होती है।
  • ग्लोबल वार्मिंग :- वायु में कार्बन डाइऑक्साइड गैस की अधिक सम्भवतः विश्व ऊष्णन (ग्लोबल वार्मिंग) का कारण बनती हैं।
  • ईंधन के अपूर्ण दहन से विषैली कार्बन मोनोक्साइड गैस बनती हैं।
  • लकड़ी को जलाने से धुँआ उत्पन्न होता है जो मनुष्य के श्वसन के लिए हानिकारक है।

आप सभी को LPG गैस ईंधन का उपयोग करना चाहिए।

अध्याय 7: पौधें एवं जंतुओं का संरक्षण                (Protection of Plants and Animals)

  • जैवमण्डल क्या है। वनस्पतिजात एवं प्राणिजात किसे कहते हैं। पौधें एवं जंतुओं का संरक्षण।  वन्यप्राणी अभ्यारण , राष्ट्रीय उद्यान एवं जैवमण्डल आरक्षित क्षेत्र जो वन एवं वन्यप्राणियों के संरक्षण हेतु बनाए गए हैं।
  • वन एवं वन्यप्राणियों का संरक्षण :- संरक्षण हेतु क्षेत्र चिन्हित किए गए हैं।
  • जैवमण्डल :- वन्य जीवन , पौधों और जंतु संसाधनों को संरक्षण के उद्देश्य हेतु आरक्षित क्षेते बनाए गए हैं।
  • पचमढ़ी अभ्यारण्य जैवमण्डल आरक्षित क्षेत्र है।
  • सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान आरक्षित क्षेत्र है।
  • बोरी एवं पचमढ़ी वन्यजंतु अभ्यारण है।
  • पेड़-पौधें एवं जीव-जंतु :- जैवमण्डल आरक्षित क्षेत्र
  • वनस्पतिजात :- किसी विशेष क्षेत्र में पाए जाने पेड़-पौधें को वनस्पतिजात कहते हैं।
  • प्राणीजात :- किसी विशेष क्षेत्र में पाए जाने जीव-जंतु को प्राणिजात कहते हैं।
  • साल , सागौन , आम , जामुन , अर्जुन इत्यादि आरक्षित वनस्पतिजात क्षेत्र हैं।
  • चिंकारा , नील गाय , हिरण , तेंदुआ , भेड़िया इत्यादि आरक्षित प्राणिजात क्षेत्र है।
  • राष्ट्रीय उद्यान :- प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और जैव विविधता के संरक्षण के लिए बनाए जाते हैं।
  1. यह वनस्पतिजात , प्राणिजात , दृश्यभूमि तथा ऐतिहासिक वस्तुओं का संरक्षण करते हैं।
  2. सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान भारत का प्रथम आरक्षित वन है।
  3. सरकार ने बाघों के संरक्षण हेतु प्रोजेक्ट टाइगर शुरू किया ।
  • संकटापन्न जंतु :- वे जंतु जिनकी संख्या एक निर्धारित स्तर से कम होती जा रही है और विलुप्त की कगार पर है।
  • पारितंत्र :- किसी क्षेत्र के सभी जीव-जंतु और पेड़-पौधें संयुक्त रूप से किसी पारितंत्र का निर्माण करते हैं।
  • प्रवास :- जलवायु में परिवर्तन के कारण पक्षी प्रत्येक वर्ष सुदूर क्षेत्रों से एक निश्चित समय पर उड़ कर आते हैं। यहाँ अंडे देने के लिए आते हैं। बहुत अधिक शीत के कारण वह स्थान उस समय जीवनयापन हेतु अनुकूल नही होता इसलिए सुदूर क्षेत्रों से तक लम्बी यात्रा करते है।
  • वनोन्मूलन का अर्थ :- वनों को समाप्त करने पर प्राप्त भूमि का अन्य कार्यों में उपयोग करना।
  1.  कृषि के लिए भूमि प्राप्त करना।
  2.  घरों एवं कारखानों का निर्माण।
  3.  फर्नीचर बनाने तथा लकड़ी का ईंधन के रूप में उपयोग।
  • वनोन्मूलन के परिणाम :-
  1. पृथ्वी का ताप एवं प्रदूषण के स्तर में वृद्धि होती है।
  2. वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर बढ़त है।
  3. भौम जल का स्तर का भी निम्नीकरण हो जाता है।
  4. वर्षा , बाढ़ एवं सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाओं बढ़ जाती है।
  •  पुनवनरोपण :- काटे गए वृक्षों का रोपण करना है।
  1. हमें कम से कम उतने वृक्ष तो लगाने ही चाहिए जितने हम काटते हैं।
  2. यदि वनोन्मूलित क्षेत्र को अबाधित छोड़ दिया जाए तो यह स्वतः पुन स्थापित हो जाता हैं।
  3. वन संरक्षण अधिनियम का उद्देश्य प्राकृतिक वनों का परिरक्षण और संरक्षण करना है।
  4. लोगों की आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु वनों को आरक्षित , सुरक्षित , रक्षित वर्गों में बाँटा गया है।

अध्याय 8: कोशिका संरचना एवं प्रकार्य                       (Cell Structure and Function)

  • कोशिका किसे कहते है | सिद्धांत । संरचना |प्रकार |भाग | खोज ? आप पहले ही पढ़ चुके हैं कि हमारे आस-पास की वस्तुएँ या तो सजीव है या निर्जीव। सभी सजीव कुछ मूलभूत कार्य संपादित करते हैं।
  • कोशिका :- रॉबर्ट हुक ने 1665 में बोतल की कार्क की एक पतली परत के अध्ययन के आधार पर मधुमक्खी के छत्ते जैसे कोष्ठ देखे और इन्हें कोशा नाम दिया। यह तथ्य उनकी पुस्तक माइक्रोग्राफ़िया में छपा। राबर्ट हुक ने कोशा-भित्तियों के आधार पर कोशा शब्द प्रयोग किया।1831 में रॉबर्ट ब्राउन ने कोशिका में ‘केंद्रक एवं केंद्रिका’ का पता लगाया।कोई भी संरचना फिर वह सजीव है या निर्जीव उसे बनाने में सूक्ष्म संरचनाओं का योगदान होता है।

सजीवों के शरीर की रचनात्मक और क्रियात्मक इकाई है और प्राय: स्वत: जनन की सामर्थ्य रखती है। यह विभिन्न पदार्थों का वह छोटे-से-छोटा संगठित रूप है जिसमें वे सभी क्रियाएँ होती हैं जिन्हें सामूहिक रूप से हम जीवन कहतें हैं।

  • भवन निर्माण के लिए ईट एवं सजीवों में कोशिका , दोनों ही मूलभूत संरचनात्मक इकाई है।
  • भवन निर्माण में एकसमान ईंटों का प्रयोग होता है परंतु उनकी आकृति , डिजाइन एवं साइज अलग-अलग होते हैं।
  •  इसी प्रकार सजीव जगत के जीव एक-दूसरे से भिन्न होते हुए भी कोशिकाओं के बने होते हैं।
  •  ईंट की अपेक्षा सजीवों की कोशिकाओं की संरचना अधिक जटिल होती हैं।
  • सजीवों में विभिन्नता :- पृथ्वी पर लाखों जीव जिनके अंगों की आकृति , साइज़ एवं कोशिकाओं की संख्या में भी भिन्नता होती हैं।
  • कोशिकाओं की संख्या –
  • एक कोशिका जीव :- ये जीव सिर्फ एक कोशिका से बने होते हैं।
  • जैसे – अमीबा , जीवाणु आदि। अमीबा भोजन का अंतर्ग्रहण करता तथा पचता है और श्वसन , उत्सर्जन , वृद्धि एवं प्रजनन भी करता है।
  • बहुकोशिका जीव :- ये जीव जिनका शरीर एक से अधिक कोशिकाओं से बना होता है ।
  • जैसे – कवक , जानवर आदि। बहुकोशिका जीव भी भोजन , श्वसन , उत्सर्जन , वृद्धि एवं प्रजनन कोशिकाओं का समूह द्वारा संपादित किए जाते है।
  • कोशिका की आकृति –
  • अमीबा एक पूर्ण विकसित जीव है जिसका स्वतंत्र अस्तित्व है। यह आकृति बदलता रहता है।
  • मनुष्य के रक्त में पाई जाने वाली श्वेत रक्त कोशिकाएँ (WBC) भी एक -कोशिकीय संरचना जो अपनी आकृति बदल सकती हैं।
  • कोशिका सामान्यत –

1. गोलाकार रक्त कोशिकाएँ

2. तर्करूपी पेशी कोशिका

3. लम्बी शाखान्वित तंत्रिका कोशिका।

  • कोशिका का साइज़  –
  1. सजीवों में कोशिका का साइज़ 1 मीटर का 10 लाखवें भाग ( माइक्रोमीटर अथवा माइक्रोन) के बराबर छोटा हो सकता है अथवा कुछ सेंटीमीटर लंबा हो सकता है।
  2. अधिकतर कोशकाएँ अति सूक्ष्मदर्शिय होती हैं एवं नग्न आँखों से दिखाई नही देती।
  3. जीवाणु कोशिका की सबसे छोटी कोशिका का साइज़ 0.1 से 0.5 माइक्रोमीटर है ।
  4. शुतुरमुर्ग का अंडा सबसे बडी कोशिका जिसका साइज़ 170 mm × 130 mm होता है।
  • कोशिका संरचना एवं प्रकार्य :- किसी तंत्र में प्रत्येक अंग अलग-अलग प्रकार्य करता है।

जैसे- पाचन , स्वांगीकरण तथा अवशोषण।

  • पादप अंग भी विशिष्ट या विशेष प्रकार्य करते हैं।

जैसे- जड़ , जल एवं खनिजों के अवशोषण में सहायता करती हैं।

  • प्रत्येक अंग पुनः छोटे भागों से बना होता है जिसे ऊतक कहते हैं।
  • ऊतक एकसमान कोशिकाओं का वह समूह है जो एक विशिष्ट प्रकार्य करता है।
  • अंग ऊतक के बने होते हैं और ऊतक कोशिकाओं से बने होते हैं। सजीव की संरचनात्मक इकाई कोशिका है।
  • कोशिका के भाग :- कोशिका के मूल घटक हैं –
  • कोशिका झिल्ली :- विभिन्न पदार्थों के कोशिका में आवागमन का नियमन करती हैं।

            प्याज की कोशिका की सीमा।

  • कोशिका द्रव्य :- केन्द्रक एवं कोशिका झिल्ली के मध्य एक जेली के समान पदार्थ होता है जिसे कोशिका द्रव्य कहते हैं।
  • कोशिका भित्ति :- पौधों में कोशिका झिल्ली के अतिरिक्त एक बाहरी मोती परत होती है, जिसे कोशिका भित्ति कहते है।
  • कोशिका द्रव्य में माइटोकांड्रीया , गाल्जिकाय , राइबोसोम इत्यादि।
  • केन्द्रक झिल्ली में एक छोटी सघन संरचना दिखाई देती है जिसे न्यूक्लिओलस कहते है।
  • इसके अतिरिक्त केन्द्रक में धागे के समान संरचनाएँ होती है जिसे क्रोमोसोम अथवा गुणसूत्र कहलाते है।
  • प्रोकैरियोटिक कोशिका :- ऐसी कोशकाएँ जिनमें केन्द्रक झिल्ली के बिना होता है।

            उदाहरण – जीवाणु और नीले-हरे शैवाल।

  • यूकैरियोटिक कोशिका :- ऐसी कोशकाएँ जिसमें कोशिकाओं में झिल्ली युक्त सुसंगठित केन्द्रक पाया जाता है।

            उदाहरण – सभी जन्तु कोशिका , जीव–जंतु , प्रोटोजोआ ।

  • प्लैस्टिड :- रंगीन संरचनाएँ जिन्हें प्लैस्टिड कहते है। ये केवल पादप कोशिका में पाई जाती हैं।
  • हरे रंग के प्लैस्टिड्स जिनमें क्लोरोफिल पाया जाता है , जिसे क्लोरोप्लास्ट कहते है।
  • रिक्तिका :- पादप कोशिका में एक बड़ी केन्द्रीय रिक्तिका होती हैं।

जीन:- जीनों को पैत्रिक गुणों का वाहक माना जाता है। क्रोमोसोम या पितृसूत्रों का निर्माण हिस्टोन प्रोटीन तथा डिऑक्सीराइबोन्यूक्लिक ऐसिड DNA तथा राइबोन्यूक्लिक ऐसिड RNA से मिलकर हुआ होता है। जीन का निर्माण इन्हीं में से एक, डी॰ एन॰ ए॰ द्वारा होता है। कोशिका विभाजनों के फलस्वरूप जब नए जीव के जीवन का सूत्रपात होता है, तो यही जीन पैतृक एवं शरीरिक गुणों के साथ माता पिता से निकलकर संततियों में चले जाते हैं। यह आदान प्रदान माता के डिंब (ovum) तथा पिता के शुक्राणु (sperms) में स्थित जीनों के द्वारा संपन्न होता है।

 अध्याय 9 : जंतुओं में जनन                       (Reproduction in Animals)

  • जंतुओं में जनन। जनन की विधियाँ लैंगिक जनन और अलैंगिक जनन ।
  • जंतुओं में जनन :- जंतुओं में भी नर एवं मादा में विभिन्न जनन भाग अथवा अंग होते हैं।
  • जनन की विधियाँ :- जंतुओं में भी जनन की दो विधियाँ होती हैं। यह हैं 
  • लैंगिक जनन :- इस प्रकार का जनन जिसमें नर तथा मादा युग्मक का संलयन होता है , लैंगिक जनन कहलाता है।
  • नर जनन अंग :- नर जनन अंगों में एक जोड़ा वृषण , दो शुक्राणु नलिका तथा शिशन (लिंग) होते हैं।
  • वृषण नर युग्मक उत्पन्न करते हैं जिन्हें शुक्राणु कहते हैं।
  • मादा जनन अंग :- मादा जननांगों में एक जोड़ी अंडाशय (डिंब वाहिनी) तथा गर्भाशय होता है।
  • अंडाशय मादा युग्मक उत्पन्न करते हैं जिसे अंडाणु (डिंब) कहते हैं।
  • गर्भाशय वह भाग है जहाँ शिशु का विकास होता है।
  • निषेचन :- जनन प्रक्रम का पहला चरण शुक्राणु और अंडाणु का संलयन निषेचन कहलाता है।
  • युग्मनज :- निषेचन के परिणाम स्वरूप युग्मनज का निर्माण होता है।
  • निषेचन के प्रक्रम में स्त्री (माँ) के अंडाणु और नर (पिता) के शुक्राणु का संयोजन होता है।
  • नयी संतति में कुछ लक्षण अपनी माता से तथा लक्षण अपने पिता से वंशानुगत होते हैं।
  • आंतरिक निषेचन :- वह निषेचन जो मादा के शरीर के अंदर होता है।

            मनुष्य , गाय , कुत्ते तथा मुर्गी इत्यादि में अनेक जंतुओं में आंतरिक निषेचन होता है

  • बाह्य निषेचन :- जिसमें नर एवं मादा युग्मक का संलयन मादा के शरीर के बाहर होता हैं।

            यह मछली , स्टारफिश जैसी जलीय प्राणियों में होता है।

  • भ्रूण का परिवर्धन :- निषेचन के परिणामस्वरूप युग्मनज बनता है जो विकसित होकर भ्रूण में परिवर्धित होता है।
  • गर्भाशय में भ्रूण का निरन्तर विकास होता रहता है।
  • जब गर्भ का विकास पूरा हो जाता है तो माँ नवजात शिशु को जन्म देती है।
  • आंतरिक निषेचन में युग्मनज लगातार अंडवाहिनी के नीचे बढ़ने लगता है जिससे अंडे पर कठोर परत चढ़    जाती है।
  • कठोर कवच के पूर्ण रूप से बन जाने के बाद मुर्गी अंडे का निर्मोचन करती है।
  • मुर्गी के अंडे को चूजा बनने में लगभग 3 सप्ताह का समय लगता है।
  • चूजे को पूर्ण रूप से विकसित होने के बाद कवच के प्रस्फुटन के बाद चूजा बाहर आता है।
  • वह जंतु जो सीधे ही शिशु को जन्म देते हैं जरायुज जंतु कहलाते हैं।
  • वे जंतु जो अंडे देते हैं अंडप्रजक जंतु कहलाते हैं।
  •  शिशु से वयस्क :- नवजात जन्मे प्राणी अथवा अंडे के प्रस्फुटन से निकले प्राणी , तब तक वृद्धि करते रहते हैं जब तक कि वे वयस्क नही हो जाते ।
  • रेशम किट के जीवन चक्र :- अंडा –> लारवा अथवा झिल्ली –> प्यूपा –> वयस्क
  • मेंढक के अंडे :- अंडा –> टैडपोल ( लारवा ) –> वयस्क
  • अलैंगिक जनन :- जिसमें केवल एक ही जनन नए जीव को जन्म देता है अलैंगिक जनन कहते हैं।
  • मुकुलन :- हाइड्रा में मुकुल से नया जीव विकसित होता है ।
  • दिखंडन :– जिसमें जीव विभाजित होकर दो संतति उत्पन्न करता है।

            जैसे – अमीबा पुष्पीय पौधों में पुष्प ही जनन अंग हैं।

अध्याय 10 : किशोरावस्था की ओर                                  (To Adolescence)

  • किशोरावस्था क्या है। किशोरावस्था की उम्र। किशोरावस्था के लक्षण। यौवनावस्था में होने वाले परिवर्तन। इस लेख में हम मानव के शरीर मे होने वाले परिवर्तनों के बारे में पढ़ेंगे।
  • बालकों की तीन अवस्था :-

1. शैशवावस्था, जो एक 01 से 06 तक रहती है।

2. बाल्यावस्था जो 06 वर्ष से 12 वर्ष तक रहती है।

3. किशोरावस्था जो 12 वर्ष से 18 वर्ष तक रहती है।

  • किशोरावस्था :- शरीर में ऐसे परिवर्तन होते हैं जिसके परिणामस्वरूप जनन परिपक्वता आती है , जिसे किशोरावस्था कहते है।
  • किशोरावस्था लगभग 12 वर्ष की आयु से प्रारंभ होकर 18 वर्ष की आयु तक रहती है।
  • लड़कियों में यह अवस्था लड़को की अपेक्षा एक या दो वर्ष पूर्व प्रारंभ हो जाती हैं।
  • यौवनावस्था :- किशोरावस्था के दौरान मनुष्य के शरीर में अनेक परिवर्तन आते हैं , जिसे यौवनावस्था कहते हैं।
  • यौवनावस्था में परिवर्तन :- यौवनावस्था के दौरान होने वाला सबसे अधिक दृष्टिगोचर परिवर्तन है।
  • इस समय अस्थियों , पेशियों एवं लंबाई में वृद्धि होती हैं।
  • लड़कियों लड़को की अपेक्षा अधिक तीव्रता से बढ़ती है।
  • 18 वर्ष की आयु तक दोनों अपनी लंबाई प्राप्त कर लेते हैं।
  • लंबाई माता-पिता से प्राप्त जिन पर भी निर्भर करती हैं।
  • शारीरिक आकृति में परिवर्तन :-
  • लड़को में कंधे फैल जर चौड़े हो जाते हैं।
  • लड़कियों में कमर का निचला भाग चौड़ा हो जाता है।
  • स्वर में परिवर्तन :-
  • लड़को में स्वरतंत्र विकसित होकर बड़ा और उभरे भाग के रूप में दिखाई देता है।
  • लड़कियों में ‘ स्वरयंत्र ‘ छोटा होता है अतः बाहर से सामान्यतः दिखाई नही देता।
  • स्वेद एवं तैलग्रन्थियो में वृद्धि :-
  • किशोरावस्था में स्वेद एवं तैलग्रन्थियो के स्राव बढ़ जाता है।
  • जिसके कारण व्यक्तियों के चेहरे पर फुंसियाँ और मुँहासे हो जाते हैं।
  • किशोरावस्था में परिवर्तन :-
  1. इस अवस्था में मस्तिष्क की सीखने की क्षमता सर्वाधिक होती हैं।
  2. इस अवस्था में सोचने एवं समझने के ढंग में परिवर्तन आता है।
  3. इस अवस्था में शारीरिक एवं मानसिक परिपक्वता प्राप्त हो जाता हैं।
  • गौण लैंगिक लक्षण :-
  1. युवावस्था में लड़कियों में स्तनों का विकास होने लगता है।
  2. लड़को के चेहरे पर दाढ़ी-मूँछ आने लगती हैं।
  3. लड़को में यौवनारम्भ के साथ ही वृषण पौरुष हार्मोन अथवा टेस्टोस्टेरोन का स्त्रवण प्रारंभ कर देता है।
  4. लड़कियों में यौवनारम्भ के साथ अंडाशय स्त्री हार्मोन अथवा एस्ट्रोजन उत्पादित करना प्रारंभ कर देता है।
  • मानव में जनन-काल की अवधि :- जब किशोरों के वृषण तथा अंडाशय युग्मक उत्पादित करने लगते हैं तब वे जनन के योग्य हो जाते हैं। टेस्टोस्टेरोन नर हार्मोन है तथा एस्ट्रोजन मादा हार्मोन है ।
  • गर्भाशय की दीवार निषेचित अंडाणु (युग्मनज) को ग्रहण के लिए अपने आपको तैयार करती है।
  • निषेचन न होने की स्थिति में गर्भाशय की दीवार की आंतरिक साथ निस्तारित होकर शरीर से बाहर रक्त के  साथ प्रवाहित होने लग जाता है जिसे ऋतुस्राव अथवा रजोधर्म कहते है।
  • स्त्रियों में जननावस्था का प्रारंभ ( 12 वर्ष से हो जाता है तथा 50 वर्ष की आयु तक चलता रहता है।)
  • लड़का अथवा लड़की ?
  • निषेचित अंडाणु में धागे-सी संरचना अर्थात गुणसूत्रों में निहित होता हैं।
  • स्त्री में X , X गुणसूत्र होते है।
  • पुरुष में X ,Y गुणसूत्र होते है।
  • लड़की :- जब X गुणसूत्र वाला शुक्राणु अंडाणु को निषेचित करता है तो युग्मनज में X X गुणसूत्र होंगे तब मादा शिशु विकसित होगा।
  • लड़का :- यदि अंडाणु को निषेचित करने वाले शुक्राणु में X गुणसूत्र है तो युग्मनज नर शिशु विकसित होगा।
  •  मनुष्य में लिंग निर्धारण किशोरावस्था में संतुलित आहार करना तथा व्यक्तिगत स्वच्छता का पालन करना महत्वपूर्ण है।

अध्याय 11 : बल तथा दाब                                                (Force and Pressure)

  • बल तथा दाब क्या है। अभिकर्षण और अपकर्षण क्या है। घर्षण क्या है। गुरुत्वाकर्षण बल । वायुमंडलीय दाब। चुंबकीय बल।
  • बल :- किसी वस्तु पर लगने वाले धक्के (अभिकर्षण) या खिंचाव (अपकर्षण) को बल कहते हैं।

            ठोकर मारना , हिट करना , धक्का देना , खींचना आदि।

  • अभिकर्षण :– किसी वस्तु को को गति में लाने के लिए उसे खींचना पड़ता हैं।

            जैसे :- कुऍं से पानी की बाल्टी को खींचना।

  • अपकर्षण :- किसी वस्तु को को गति में लाने के लिए उसे धक्का देना पड़ता हैं।

            जैसे :- कार को धक्का लगाना।

  • बल अन्योन्यक्रिया के कारण लगते हैं।
  • बल लगने के लिए कम से कम दो वस्तुओं में अन्योन्यक्रिया होना आवश्यक है।
  • कार को गति देने के लिए आदमी को इसे धक्का लगाना होगा।
  • किसी वस्तु पर एक ही दिशा में लगाए गए बल जुड़ जाते है।

            जैसे – बॉक्स को धक्का देना।

  • किसी वस्तु पर दो बल विपरीत दिशा में कार्य करते हैं तो इस पर लगने वाला बल बराबर होता है।

            उदाहरण – रस्से को दोनों टीमें समान बल से खिंचती है तो रस्सा खिसकता नहीं है।

  • बल वस्तु की गति की अवस्था में परिवर्तन कर सकता है।
  • क्रिकेट में बल्लेबाज बल्ले से गेंद पर बल लगाकर शॉर्ट खेलतें हैं।

            उदाहरण – पेनल्टी किक लेते समय खिलाड़ी गेंद पर बल लगाता है।

  • गति की अवस्था :- किसी वस्तु की अवस्था का वर्णन इसकी चाल तथा गति की दिशा से किया जा सकता है।
  1. कोई वस्तु विराम अवस्था में अथवा गतिशील में हो सकती है, दोनों ही इसकी गति की अवस्थाएँ हैं।
  2. बल लगने पर सदैव ही किसी वस्तु की गति की अवस्था में परिवर्तन होगा।
  3. अनेक बार बल लगाने पर भी वस्तु की गति की अवस्था में परिवर्तन नही होता।
  4. बल किसी वस्तु की आकृति में परिवर्तन कर सकता है।
  5. किसी वस्तु को विराम अवस्था से गति में ला सकता है।
  6. गतिशील वस्तु चाल में परिवर्तन कर सकता है।
  7. गतिशील वस्तु की दिशा में परिवर्तन कर सकता है।
  8. किसी वस्तु की आकृति में परिवर्तन ला सकता है।
  • सम्पर्क बल :- आपके शरीर का वस्तु के साथ सम्पर्क होता है ।

            जैसे – पुस्तक को उठाना , छड़ी को उठाना , पानी की बाल्टी उठाना आदि।

  • पेशीय बल :- हमारी मांसपेशियों के क्रियास्वरूप लगने वाले बल को पेशीय बल कहते हैं।

            जैसे – श्वसन प्रक्रिया में , वायु अंदर लेते तथा बाहर निकालते समय , फेफड़े फैलते और सिकुड़ते हैं ।

  • घर्षण :- वस्तुओं की गति की अवस्था में परिवर्तन घर्षण बल के कारण होता है।
  1. घर्षण बल सभी गतिशील वस्तुओं पर लगता है।
  2. इसकी दिशा सदैव गति की दिशा के विपरीत होती है।
  3. घर्षण बल दो सतहों के बीच सम्पर्क के कारण उत्पन्न होता है।

जैसे- साइकिल चलाते समय पेडल चलाना पड़ता हैं।

  • असम्पर्क :- दो वस्तुओं के बीच आकर्षण (खींचना) अथवा प्रतिकर्षण (धक्का देना) के रूप ने देखा जा सकता है।
  • चुंबकीय बल :- दो चुंबकों को समीप लाने पर गति करने लगता है।

            चुंबक द्वारा किसी लोहे के टूकड़े पर लगाया गया बल असम्पर्क बल है।

  • स्थिरवैधुत बल :- एक आवेशित वस्तु द्वारा किसी दूसरी आवेशित अथवा अनावेशित वस्तु पर लगाया गया बल स्थिरवैधुत बल कहलाता है।

            उदाहरण – स्ट्रॉ

  • गुरुत्वाकर्षण बल :- विश्व में सभी वस्तुएँ , चाहे वे छोटी हों या बड़ी हो , एक दूसरे के ऊपर बल लगाती है। यह गुरुत्वाकर्षण बल कहलाता है।
  • गुरुत्व बल :- वस्तुएँ पृथ्वी की ओर इसलिए गिरती हैं क्योंकि यह उन्हें अपनी ओर आकर्षित करती हैं।
  • गुरुत्वाकर्षण की खोज :- न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण का पता लगाने की घटना , 350 वर्ष पुरानी हैं ,वर्ष 1726 की वसंत में एक दिन एक सेब के पेड़ की छाया में न्यूटन ने उन्हें इस घटना के बारें में बताया ,न्यूटन बैठे सोच रहे थे ,जब एक सेब गिरा।
  •   दाब :- किसी पृष्ठ के प्रति एकांक क्षेत्रफल पर लगने वाले बल को दाब कहते हैं।

                                     बल

  •  दाब = —————————–

              क्षेत्रफल जिस पर लगता है।

  • कुली अपने सिर के ऊपर गोल कपड़ा लपेट कर रखते है जिससे उनके शरीर से बोझ के सम्पर्क क्षेत्रफल को बढ़ा देते है। अतः उनके शरीर पर लगने वाला दाब कम हो जाता है।
  • द्रव्य बर्तन की दीवारों पर दाब डालते है।

            जैसे – पानी की पाइप से लीक होने पर फुव्वारों का निकलना।

  • गैसों जिस पर बर्तन में रखी जाती हैं उसकी दीवारों पर दाब डालती है।

            जैसे – साइकिल की ट्यूब में गैस भरी जाती हैं।

  • वायुमंडलीय दाब :- वायु द्वारा लगाए गए दाब को वायुमंडलीय दाब कहते हैं।
  • वायुमंडलीय वायु पृथ्वी के तल से कई किलोमीटर ऊपर तक फैली हुई हैं।

अध्याय 12 : घर्षण (Friction)

  • घर्षण किसे कहते हैं। घर्षण बल तथा कर्षण बल। घर्षण के प्रकार सर्पी घर्षण व स्थैतिक घर्षण ।
  • आपने ट्रैफिक सिग्नल पर कार अथवा बाइक चालक को अपने वाहन को मंद करते देखा होगा आप भी ब्रेक लगाकर अपनी साइकिल को मंद करते हैं।
  • घर्षण :-  वस्तुओं की गति की अवस्था में परिवर्तन घर्षण बल के कारण होता है।
  1. घर्षण बल सभी गतिशील वस्तुओं पर लगता है।
  2. इसकी दिशा सदैव गति की दिशा के विपरीत होती है।
  3. घर्षण बल दो सतहों के बीच सम्पर्क के कारण उत्पन्न होता है।

                        जैसे- साइकिल चलाते समय पेडल चलाना पड़ता हैं।

  • घर्षण को प्रभावित करने वाले कारक :-
  • घर्षण : – हानिकारक परंतु अनिवार्य
  1. यदि घर्षण न हो तो आप पेन अथवा पेंसिल से नही लिख सकते है।
  2. घर्षण के कारण ही दीवार में कील गड़ जाती हैं।
  3. घर्षण के कारण जूतों के तले घिस जाते हैं।
  4. घर्षण के कारण माचिस की तीली को रगड़ने पर वह आग पकड़ लेती हैं।
  • घर्षण बढ़ाना तथा घटाना –
  1. जूते की तलियों को खाँचेदार बनाकर घर्षण अधिक किया जाता है।
  2. टायरों की तलियों को खाँचेदार बनाकर घर्षण अधिक किया जाता है।
  3. घर्षण कम करने के लिए कैरम बोर्ड पाउडर छिड़का जाता है।
  4. घर्षण कम करने वाले पदार्थों को स्नेहक कहते है।
  • पहिए घर्षण कम कर देते हैं।
  • अटैचियों में लोटन घर्षण को कम कर देते है।
  • रोलर द्वारा भी समान खीचना आसान है।
  • स्थैतिक घर्षण :- जब किसी वस्तु पर बाह्य बल कार्य करता है लेकिन फिर भी वस्तु गति नहीं करती है तो बल के विपरीत जो घर्षण बल कार्य करता है उसे स्थैतिक घर्षण बल कहते है।
  • स्थैतिक घर्षण के नियम :-
  • एक-दूसरे के सम्पर्क में रखे दो तलों या वस्तुओं के बीच घर्षण बल की दिशा हमेशा उनकी गति की दिशा या गति करने की दिशा के विपरीत होती है।
  • सर्पी घर्षण :- वह घर्षण बल जो सम्पर्क में आए दो तलों के परस्पर फिसलने पर उत्पन्न होता है, सर्पी घर्षण कहलाता है।
  1. सर्पी घर्षण स्थैतिक घर्षण से कम होता है।
  2. लोटनिक घर्षण सर्पी घर्षण से कम होता है।

            उदाहरण – छत के पंख , बाल बेयरिंग घर्षण कम कर देते हैं।

  • तरल घर्षण :- तरल में गति करने वाली वस्तुओं को उचित आकृति प्रदान करके घर्षण बल को कम किया जा सकता है।
  1. मछली तथा पक्षी तरल में गति करते हैं।
  2. हवाई जहाज और पक्षी की आकृति की बनावट समान है
  • कर्षण :- तरल के अन्दर गति करने वाले किसी वस्तु पर सापेक्ष गति के विपरीत दिशा में लगने वाले बल को कर्षण कहते हैं।
  •  घर्षण हमारे बहुत से क्रियाकलापों के लिए महत्वपूर्ण होता है।

     अध्याय 13 : ध्वनि (Sound)

  • ध्वनि क्या है। ध्वनि के गुण। ध्वनि के लक्षण। ध्वनि के प्रकार। मानव कान की श्रव्य तथा अश्रव्य ध्वनि।
  • अपने विद्यालय में क्लास (पीरियड) समाप्त होने पर बेल बजाता है। और दरवाजे खटखटाने की ध्वनि से पता चल जाता हैं कोई आया है।
  • ध्वनि क्या है :- ध्वनि एक प्रकार की तरंग है जो वस्तुओं के कम्पन होने से उत्पन्न होती है।
  • ध्वनि को एक जगह से दूसरी जगह तक जाने के लिए माध्यम की जरूरत होती है।
  • ध्वनि ठोस , द्रव्य और गैस के माध्यम से सफर करती है।
  • ध्वनि के गुण :- ध्वनि के दो महत्वपूर्ण गुण है।
  • आवृत्ति :- किसी वस्तु का कोई कण एक सेकेंड में जितना कम्पन करता है , उसे आवृति कहते हैं।
  • आवृति को हर्ट्ज (Hz) में मापा जाता है।
  • आयाम :- कम्पन करते कण के अधिकतम विस्थापन को आयाम कहते हैं।
  • ध्वनि के लक्षण :- ध्वनि के निम्नलिखित लक्षण हैं 
  • तीव्रता :- तीव्रता से ध्वनि के मन्द या प्रबल होने का पता चलता है।
  1. ध्वनि आयाम ज्यादा होती है तो ध्वनि की तीव्रता भी ज्यादा होती हैं।
  2. धध्वनि की तीव्रता कम होती है तो ध्वनि मन्द होती है।
  3. तीव्रता को डेसिबल(DB) में मापा जाता है।
  • तारत्व :- तारत्व से ध्वनि के मोटे / भारी होने का पता चलता है।
  • ध्वनि की आवृत्ति बढ़ती है तो ध्वनि पतली हो जाती हैं।

            जैसे – महिला की आवाज

  • ध्वनि की आवृत्ति घटती है तो ध्वनि भारी हो जाती है।

            जैसे- पुरुष की आवाज ।

  • गुणता :- एक समान तीव्रता और एक समान तारत्व की ध्वनियों में आए अंतर को कहते हैं।
  1. महिलाओं को ध्वनि का तारत्व एक समान होता है लेकिन उनकी ध्वनियों की गुणता  अलग-अलग होती हैं।
  2. पुरुषों की ध्वनि की तीव्रता एक समान होती है लेकिन उनकी ध्वनियों की गुणता अलग-अलग होती है।
  • ध्वनि के प्रकार :- ध्वनि के तीन प्रकार है।
  • श्रव्य तरंगे :- इन ध्वनि तरंगों को मनुष्य सुन सकता है।
  • इन तरंगों की आवृत्ति है: 20 हर्ट्ज से 20,000 हर्ट्ज।
  • अवश्रव्य :- इन ध्वनि तरंगों को मनुष्य नही सुन सकता है।
  • गाय , हाथी , गैण्डा आदि जानवर इन तरंगों को सुन सकते है।
  • इन तरंगों की आवृत्ति 20 हर्ट्ज से कम होती है।
  • पराश्रव्य तरंगे :- इन तरंगों को भी मनुष्य सुन नही सकता है।
  • कुत्ता , बिल्ली , चमगादड़ , डॉल्फिन , चूहे आदि जानवर इन तरंगों को सुन सकते हैं।
  • इन तरंगों की आवृत्ति 20,000 हर्ट्ज से अधिक होती है।
  • कंपन का आयाम :-
  • दोलन गति :- किसी वस्तु का बार-बार इधर-उधर गति करना कंपन कहलाता है।
  • आवृत्ति :- प्रति सेकंड होने वाले दोलनों की संख्या को दोलन की आवृत्ति कहते हैं।

            आवृति को हर्ट्ज (Hz) में मापा जाता है।

  • स्वर ध्वनि :- वाद्ययंत्रों की ध्वनियों का आनन्द लेते हैं।
  • सितार , तबला , हारमोनियम , बाँसुरी आदि।
  • ध्वनि प्रदूषण :- वातावरण में अत्यधिक या अवांछित ध्वनियों को ध्वनि प्रदूषण कहते हैं।

           जैसे – वाहनों की ध्वनियाँ , पटाखों का फटना , लाउडस्पीकर आदि।

  • हानियाँ – अनिद्रा , अति तनाव , चिन्ता आदि।
  • उपाय – वायुयानों के इंजनों , यातायात के वाहनों , औद्योगिक मशीनों तथा घरेलू उपकरणों में ‘ रवशामक ‘ युक्तियाँ लगानी चाहिए।
  • ड़क के किनारे तथा अन्य स्थानों पर पेड़ लगाने से ध्वनि प्रदूषण को कम किया जा सकता है।

अध्याय 14 : विद्युत धारा के रासायनिक प्रभाव      (Chemical Effects of Electric Current)

  • विद्युत धारा की परिभाषा। विद्युत धारा के प्रभाव। विद्युत प्रकार
  • विद्युत धारा :- किसी विद्युत परिपथ में इलेक्ट्रॉन के प्रवाह को विद्युत धारा कहते हैं। यह एक अदिश राशि है, इसका मात्रक एम्पियर होता है।  विद्युत धारा को मापने के लिए अमीटर का उपयोग किया जाता है।
  • विद्युत धारा और इलेक्ट्रॉन के प्रवाह की दिशा हमेशा एक-दूसरे के विपरीत होती है। जहां पर विद्युत धारा का प्रवाह धन आवेश से ऋण आवेश की ओर होता है, वहां पर इलेक्ट्रॉन का प्रवाह ऋण आवेश से धन आवेश की ओर होता है।
  •  विद्युत धारा के प्रकार :-

1.प्रत्यावर्ती धारा :- ऐसी विद्युत धारा जिसकी दिशा व मान बदलता या परिवर्तित होता रहता है, उसे प्रत्यावर्ती धारा कहते हैं।

  1. इस विद्युत धारा की आवृत्ति 50 हर्ट्ज होती है।
  2. हमारे घरों में हेडिल से आने वाली लाइट प्रत्यावर्ती धारा ही होती है।
  3. यह धारा हमें अल्टरनेट, ओसिलेटर इत्यादि से प्राप्त होती है।

2.दिष्ट धारा :- ऐसी विद्युत धारा जिसकी दिशा व मान बदलता या परिवर्तित नहीं होता रहता है, उसे दिष्ट धारा कहते हैं।

  1. इस विद्युत धारा की आवृत्ति 0 (zero) हर्ट्ज होती है।
  2. यह धारा हमें मोबाइल बैटरी, इन्वर्टर, सेल, डी. सी. जनरेटर इत्यादि से प्राप्त होता है।
  • विद्युत धारा का रासायनिक प्रभाव :- जब विद्युत धारा किसी द्रव्य अर्थात किसी पानी में मिले अम्ल में प्रवाहित करते है , तब उसके आयंस विभक्त हो जाते है।
  • यह घटना विद्युत धारा के रासायनिक प्रभाव के कारण ही होती है।
  • जब विद्युत को सुचालक तरल पदार्थ से गुजारते है , तब रासायनिक प्रक्रिया के कारण वह अपने आयंस मे बट जाएं उसे रासायनिक प्रभाव कहते है।
  • विद्युतलेपन :- विद्युत धारा द्वारा किसी पदार्थ पर वांछित धातु की परत निक्षेपित करने की प्रक्रिया को विद्युतलेपन कहते है।
  1. जब कॉपर सल्फेट विलयन में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तो कॉपर सल्फेट , कॉपर तथा सल्फेट में वियोजित हो जाता है।
  2. इलेक्ट्रोड से जो ताँबे की प्लेट से बना है , समान मात्रा का कॉपर विलयन में घुल जाता है।
  3. आभूषण बनाने वाली सस्ती धातुओं पर चाँदी तथा सोने का विद्युतलेपन करते हैं।
  4. खाद्य पदार्थों के भंडारण के लिए उपयोग किए जाने वाले टिन के डिब्बों में लोहे के ऊपर टिन की विद्युतलेपन किया जाता है।

अध्याय 15 : कुछ प्राकृतिक परिघटनाएँ                                 (Some Natural Phenomena)

  • प्राकृतिक परिघटना क्या है? आवेश क्या है। आवेश के प्रकार। तड़ित, भूकंप, चक्रवात

प्राकृतिक परिघटनाएँ :- प्रकृति में अचानक घटने वाली घटनाएं, प्राकृतिक परिघटना है कहलाती है।

            उदाहरण- भूकंप , भूस्खलन, बाढ़ , सूखा , चक्रवात, सुनामी आदि।

  • कुछ वस्तुओं को अन्य वस्तुओं से रगड़कर आवेशित किया जा सकता है।
  • आवेश के प्रकार :-
  • धनावेश :- रेशम से रगड़ने पर काँच की छड़ द्वारा आर्जित आवेश को धनावेश कहते हैं।
  • ऋणावेश :- एबोनाइट की छड़ में उत्पन्न आवेश को ऋणावेश कहते है।
  • रगड़ द्वारा उत्पन्न विद्युत आवेशों को स्थिर आवेश कहते हैं।
  • जब आवेश गति करते हैं तो विद्युत धारा बनती है।
  • सजातीय आवेश एक दूसरे को प्रतिकर्षित तथा विजातीय आवेश एक दूसरे को आकर्षित करते हैं।
  • तड़ित :- जब हमारे वायुमंडल में विद्युत आवेश का निकास होता है, तो उसके कारण जो कड़कड़ाहट और आकाशीय बिजली उत्पन्न होती है जिसे तड़ित कहते हैं।
  • तड़ित से बचाव के उपाय :-

1. आकाशीय बिजली से बचने के लिए घरों में तड़ित चालक लगवाएं.

2.घर में इलेक्ट्रिसिटी से चलने वाले सभी उपकरण बंद कर दें.

3.यदि आप बाइक अथवा कार से यात्रा कर रहे हैं, तो तुरंत किसी सुरक्षित जगह पर चले जाएं.

4.कभी भी किसी इकलौते पेड़ के नीचे आश्रय न लें.

5.यदि आप जंगल में फंसे हुए हैं, तो घने पेड़ों की छाया में चले जाएं.

  • भूकम्प :- पृथ्वी का कंपन अथवा कोई झटका होता है जिसे भूकम्प कहते है।
  • भूकम्प का कारण :- पृथ्वी की भूपर्पटी के भीतर गहराई में गड़बड़ के कारण उत्पन्न होता है।
  • प्लेट :- ये प्लेट निरन्तर गति करती रहती हैं।
  • प्लेटों के आपस में रगड़ या टक्कर के कारण भूकम्प आता है।
  • भारत में इंडियन प्लेट है।
  • भूकम्पीय क्षेत्र – भारत के अति भूकम्प आशंकित क्षेत्र कश्मीर , पश्चिमी तथा केन्द्रीय हिमालय , समस्त उत्तर-पूर्व , कच्छ का रन , राजस्थान तथा सिंध-गंगा के मैदान हैं।
  • भूकम्प को रिक्टर पैमाने पर व्यक्त किया जाता है।
  • भूकम्प से बचाव :-

1. घर से बाहर निकलकर खुले में आने की कोशिश करें. ऐसे जगह जाइए जहां आसपास कोई 

    बड़ी इमारत और पेड़ न हो.

2. अपने सिर और गर्दन को तकिए या हाथ से बचाने की कोशिश करें.

3. लिफ्ट का उपयोग न करे क्योंकि अचानक बिजली जाने से आप फंस सकते है.

4. अगर आप भूकंप के दौरान गाड़ी चला रहे हो तो पुल पार करने की कोशिश न करें .

5. घर में किसी बड़े फर्नीचर और खिड़की के नजदीक न रहें.

  • सुनामी :- समुद्र में पैदा होने वाले विशाल लहरों की एक श्रंखला जो पानी के अचानक विस्थापन के कारण होती उत्पन्न होती है उसे ही सुनामी कहते हैं।
  • सुनामी के कारण :-

1.समुद्री धरातल पर भूकंप का उत्पन्न होना।

2. भूकंप की अधिक तीव्रता होना।

3.ज्वालामुखी के कारण

4.भूस्खलन के कारण

  • सुनामी के बचाव :-

1. सुनामी के बारे में जानकारी हासिल करें ।

2. खतरे वाले क्षेत्र की पहचान करें।

3. आपदा के समय दी जाने वाली सेवाओं के बारे में जानकारी रखें।

4. जगह खाली करने का अभ्यास करें ।

अध्याय 16 : प्रकाश (Light)

  • प्रकाश क्या है। प्रकाश के प्रकार । प्रकाश परावर्तन के नियम । सूर्य का प्रकाश श्वेत या रंगीन। मानव नेत्र। ब्रेल प्रद्धति क्या है।
  • प्रकाश :- प्रकाश एक प्रकार की ऊर्जा है, जिसकी सहायता से हमें वस्तुएँ दिखाई देती हैं। अर्थात् जो विकिरण हमारी आँख को संवदित करती हो, प्रकाश कहलाती है।
  • प्रकाश तीन प्रकार का होता है। 

1.पराबैंगनी( UV) 

2.अवरक्त(IR) 

3. दृश्य(v)

  • परावर्तन के नियम :- दर्पण से टकराने के पश्चात , प्रकाश-किरण दूसरी दिशा में परावर्तित हो जाती है।

1.आपतित किरण :- किसी पृष्ठ पर पड़ने वाली प्रकाश-किरण को आपतित किरण कहते हैं।

2. परावर्तित किरण :- पृष्ठ से परावर्तन के पश्चात वापस आने वाली प्रकाश -किरण को परावर्तित किरण कहते हैं।

  • आपतन कोण सदैव परावर्तन कोण के बराबर होता है।

            आपतित किरण , आपतन बिंदु पर अभिलंब तथा परावर्तित किरण-ये सभी एक तल में होते हैं।

  • पाशर्व-परिवर्तन :- दर्पण द्वारा बने प्रतिबिंब में वस्तु का बायाँ भाग दाईं ओर तथा दायाँ भाग बाईँ ओर दिखाई पड़ता है।
  • विसरित परावर्तन :- जब सभी समान्तर किरणें किसी खुरदुरे या अनियमित पृष्ठ से परावर्तित होने के पश्चात समान्तर नही होती , तो ऐसे परावर्तन को विसरित परावर्तन कहते हैं।
  • नियमित परावर्तन :- दर्पण चिकने पृष्ठ से होने वाले परावर्तन को नियमित परावर्तन कहते हैं।
  • परिवर्तित प्रकाश :- प्रकाश को पुनः परावर्तित किया जा सकता है।
  • पनडुब्बियों , टैंकों तथा बंकरो में छिपे सैनिकों द्वारा बाहर की वस्तुओं को देखने के लिए किया जाता है।
  • बाल कटने के बाद पीछे के बाल कैसे कटे है उसे देखने के लिए परिदर्शी में दो समतल दर्पण का उपयोग किए जाते है।
  • सूर्य का प्रकाश :- सूर्य का प्रकाश को श्वेत प्रकाश कहलाता है , सात रंगों से मिलकर बना होता है।
  • मानव नेत्र :- हम वस्तुओं को केवल तभी देख पाते हैं जब उनसे आने वाला प्रकाश हमारे नेत्रों में प्रवेश करता है।
  1. नेत्र हमारी सबसे महत्वपूर्ण ज्ञानेन्द्रियों में से एक है।
  2. हमारे नेत्र की आकृति लगभग गोलाकार है। नेत्र का बाहरी आवरण सफेद होता है।
  3. इसके पारदर्शी अग्र भाग को कॉर्निया कहते हैं।
  4. कॉर्निया के पीछे हम गहरे रंग की पेशियों की संरचना को परितारिका कहते हैं।
  5. परितारिका में एक छोटा सा द्वार होता है जिसे पुतली कहते हैं।
  6. लेंस प्रकाश को आँख के पीछे एक परत पर फोकसित करता है जिसे रेटिना कहते है।
  7. पुतली के पीछे एक लेंस है जो केंद्र पर मोटा है।
  • सामान्य नेत्र द्वारा पढ़ने के लिए सर्वाधिक सुविधाजनक दूरी लगभग 25 Cm होती है।
  • नेत्रों की देखभाल :- सामान्य नेत्र समीप तथा दूर की वस्तुओं को स्पष्ट देख सकते हैं।
  1. यदि परामर्श दिया गया है तो उचित चश्मे का उपयोग कीजिए।
  2. सूर्य या किसी शक्तिशाली प्रकाश स्त्रोत को कभी भी सीधा मत देखिए।
  3. पठन सामग्री को सदैव दृष्टि की सामान्य दूरी पर रखकर पढ़िए।
  4. अपने नेत्रों को कभी मत रगड़िए।
  5. नेत्रों को स्वच्छ जल से धोइए।
  •  ब्रैल पद्धति :- चक्षुषविकृति युक्त व्यक्तियों के लिए सर्वाधिक लोकप्रिय साधन ब्रैल कहलाता है।
  1. लुई ब्रैल जो स्वयं एक चक्षुषविकृति युक्त व्यक्ति थे। जिसने 1821 चक्षुषविकृति युक्त व्यक्तियों के लिए एक पद्धति विकसित किया।
  2. वर्तमान पद्धति 1832 में अपनाई गई। सामान्य भाषाओं गणित तथा वैज्ञानिक विचारों के लिए ब्रैल कोड है।
  3. ब्रैल पद्धति का उपयोग करके अनेक भारतीय भाषाओं को पढ़ा जा सकता है।
  4. ब्रैल पद्धति में 63 बिंदुकित पैटर्न हैं। प्रत्येक छाप एक अक्षर , अक्षरों के समुच्चय , सामान्य शब्द अथवा व्याकरणिक चिन्ह को प्रदर्शित करती है।

अध्याय 17 : तारे एवं सौर परिवार                                     (Stars and Solar System)

  • सौरमंडल किसे कहते है। 
  • खगोलीय पिंड। 
  • पूर्णिमा एवं अमावस्या चन्द्रमा । 
  • ग्रह उपग्रह मानव निर्मित उपग्रह । 
  • तारा ध्रुव तारा। 
  • सूर्य पृथ्वी।
  • खगोलीय पिंड : – सूर्य , चंद्रमा तथा वे सभी वस्तुएँ जो रात के समय आसमान में चमकती है , खगोलीय पिंड कहलाती हैं।
  • चंद्रमा :- हमारी पृथ्वी के पास केवल एक उपग्रह है , चंद्रमा। इसका व्यास पृथ्वी के व्यास का केवल एक -चौथाई है।
  • चंद्रमा पृथ्वी से लगभग 3,84,400 किलोमीटर दूर है।
  • पूर्णिमा :- पूर्ण चंद्र को लगभग एक महीन में एक बार देख सकते हैं। यह पूर्ण चंद्रमा वाली रात या पूर्णिमा होती है।
  • अमावस्या : – 15 दिन के बाद हम इसे नहीं देख सकते। यह नये चंद्रमा की रात्रि या अमावस्या कहते हैं।
  • चन्द्रमा की भूमिका :- चन्द्रमा की कलाओं की हमारे सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका है।

            उदाहरण – दिवाली अमावस्या के दिन मनाया जाता है। गुरु नानक जंयती पूर्णिमा पर मनाई 

            जाती हैं।

  • सूर्य के परावर्तित प्रकाश के कारण चंद्रमा दिखाई देता है।
  • पृथ्वी चन्द्रमा के साथ सूर्य की परिक्रमा करता है।
  • नील आर्मस्ट्रांग :- पहले व्यक्ति थे , जिन्होंने 21 जुलाई 1969 को सबसे पहले चंद्रमा की सतह पर कदम रखा।
  • तारा :- कुछ खगोलीय पिंडे बड़े आकार वाले तथा गर्म होते है। ये गैसों से बने होते हैं। इनके पास अपनी उष्मा तथा प्रकाश होता है , जिसे वे बहुत बड़ी मात्रा में उत्सर्जित करते है ,इन खगोलीय पिंडो को तारा कहते है।
  • सूर्य भी एक तारा है।
  • ध्रुव तारा :- प्राचीन समय में , लोग रात्रि में दिशा का निर्धारण तारों की सहयता से करते थे।

            बियर या सप्तऋषि यह सात तारों का समूह है , जो की नक्षत्रमंडल अर्सा मेजर का भाग है।

  • सौर परिवार :- सूर्य , आठ ग्रह , उपग्रह तथा कुछ अन्य खगोलीय पिंड , जैसे क्षुद्र ग्रह एवं उल्कापिंड मिलकर सौरमंडल का निर्माण करते है। उसे हम सौर परिवार का नाम देते है।
  • सूर्य :- सौर परिवार का मुखिया सूर्य है , सूर्य सौरमंडल के केंद्र में स्थित है।
  • सूर्य , सौरमंडल के लिए प्रकश एवं ऊष्मा का एकमात्र स्रोत है।
  • सूर्य पृथ्वी से से लगभग 15 करोड़ किलोमीटर दूर है
  • हमारे सौरमंडल में आठ ग्रह हैं। सूर्य से दूरी के अनुसार , वे है : बुध शुक्र , पृथ्वी ,बृहस्पति , शनि , युरेनस , तथा नेप्च्यून।
  • बुध :- यह सूर्य का सबसे नजदीकी ग्रह है , यह सबसे छोटा व् सबसे हल्का ग्रह है। सूर्य के चारों ओर एक परिक्रमण -88 दिन l
  • शुक्र :- यह पृथ्वी का निकटम , सबसे चमकीला और सबसे गर्म ग्रह है। इसे साँझ का तारा या भोर का तारा कहा जाता है। इसे पृथ्वी का भगिनी ग्रह कहते है। सूर्य के चारों ओर एक परिक्रमण -255 दिन
  • मंगल :- इसे लाल ग्रह खा जाता है , इसके दो उपग्रह हैं –फोबोस और डीमोस है। सूर्य के चारों ओर एक परिक्रमण –687 दिन l
  • बृहस्पति :- यह सौरमंडल का सबसे ग्रह है। इसका उपग्रह ग्यानिमिड हैं। सूर्य के चारों ओर एक परिक्रमण –12 साल l
  • शनि :- यह आकार में दूसरा सबसे बड़ा ग्रह है। इसका उपग्रह टाइटन है। सूर्य के चारों ओर एक परिक्रमण – 29 साल
  • अरुण :- यह आकार में तीसरा सबसे बड़ा ग्रह है। इसकी खोज 1781 ई. में विलियम हर्शेल द्वारा की गयी है। इसका उपग्रह टाइटेनिया है। सूर्य के चारों ओर एक परिक्रमण – 84 साल
  • वरुण :- यह सूर्य से सबसे दिर स्थित ग्रह है। इसका उपग्रह ट्राइटन है। सूर्य के चारों ओर एक परिक्रमण – 164 साल l
  • पृथ्वी :- पृथ्वी आकार में पाँचवाँ सबसे बड़ा ग्रह है। पृथ्वी अपने अक्ष पर 23.30 झुका है। यह सौरमंडल का एकमात्र ग्रह है, जिस पर जीवन है। एकमात्र उपग्रह चन्द्रमा है। पृथ्वी क व्यास 6371 किलोमीटर है।
  • उपग्रह :- किसी ऐसे पिंड को जो अन्य पिंड की परिक्रमा करता है।

            जैसे – चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है।

  • ग्रह :- कुछ खगोलीय पिंडों में अपना प्रकाश एवं ऊष्मा नहीं होती है। वे तारों के प्रकाश से प्रकाशित होते है। ऐसे पिंड ग्रह कहलाते है।
  • क्षुद्र ग्रह :- ग्रह के ही भाग हैं जो बहुत वर्ष पहले विस्फोट के बाद ग्रहों से टूटकर अलग हो गए। ये असंख्य छोटे पिंड भी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगते हैं इन पिंडो को क्षुद्र ग्रह कहते है।
  • उल्कापिंड :- सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाने वाले पत्थरों के छोटे-छोटे टुकड़ों को उल्कापिंड कहते हैं।
  • मानव निर्मित उपग्रह :-
  1. आर्यभट्ट भारत का सर्वप्रथम उपग्रह था।
  2. भारतीय उपग्रह इनसेट (INSAT)
  3. आई.आर.एस (IRS) तथा EDUSAT आदि।
  4. कृत्रिम उपग्रहो का उपयोग मौसम की भविष्यवाणी , दूरसंचार तथा सुदूर संवेदत में किया जाता है।
  • मंगलयान :- भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने भारत का पहला मंगल कक्षित मिशन-मंगलयान 5 नवम्बर 2013 को प्रेक्षेपित किया।
  • 24 सितम्बर 2014 को मंगल के कक्षा में सफलता पूर्वक पहुँच गया।
  • भारत प्रथम प्रयास में ही इस कार्य को करने वाला विश्व में पहला देश बना।
  • कल्पना चावला प्रथम भारतीय महिला अंतरिक्ष यात्री थी।

अध्याय 18 : वायु तथा जल का प्रदूषण                         (Air and Water Pollution)

  • जल जीवन के लिए आवश्यक है। 
  • पृथ्वी पर जीवन के लिए वायुमंडल आवश्यक है। 
  • वायु तथा जल प्रदूषण के कारण एवं उपाय।
  • पृथ्वी पर जीवन के लिए वायुमंडल आवश्यक है।
  • जिस वायु का उपयोग हम साँस लेने के लिए करते हैं , वास्तव में वह अनेक गैसों का मिश्रण होती है।
  • वायु :- नाइट्रोजन 78% , ऑक्सीजन 21% , शेष 1% में कार्बनडाइऑक्साइड , कुछ अन्य गैस , जलवाष्प तथा धूल के कण होते हैं।
  • वायु प्रदूषण :- जब वायु में अनचाहे पदार्थों के द्वारा संदूषित हो जाती है जो सजीव तथा निर्जीव दोनों के लिए हानिकारक है।
  • वायु प्रदुषण के कारण :-

1. प्राकृतिक :-

  • ज्वालामुखी का फटना
  • वनों में लगा आग
  • वनों की अंधाधुंध कटाई

2. मानवीय क्रियाकलापों

  • फैक्टरी का धुँआ।
  • विद्युत संयंत्र
  • वाहनों का धुआं।
  • वाहन अधिक मात्रा में कार्बन मोनोऑक्साइड , कार्बन डाइऑक्साइड , नाइट्रोजन ऑक्साइड तथा धुआँ उत्पन्न करते हैं।
  • पेट्रोल तथा डीजल जैसे ईंधनों के अपूर्ण दहन से कार्बन मोनोऑक्साइड उत्पन्न होती हैं।
  • दमा , खाँसी , बच्चों में साँस के साथ हरहराहत उत्पन्न हो जाते हैं।
  • क्लोरोफ्लोरो कार्बन (CFC) के द्वारा वायुमंडल की ओजोन परत क्षतिग्रस्त हो जाती हैं।
  • अम्लीय वर्षा के कारण स्मारक संगरमरमर का संक्षारण होता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय :- ताजमहल को सुरक्षित रखने के लिए उद्योगों को CNG ( संपीडित प्राकृतिक गैस ) तथा LPG ( द्रवित पेट्रोलियम गैस ) जैसे ईंधनों का उपयोग करने के आदेश दिए गए हैं।
  • सूर्य की किरणें वायुमंडल से गुजरने के पश्चात पृथ्वी की सतह को गर्म करती हैं।
  • मानव क्रियाकलापों के कारण निरन्तर CO2 वातावरण में मोचित हो रही है जिससे वह क्षेत्र घट रहा है।
  • वायुमंडल के औसत ताप में निरन्तर वृद्धि हो रही है इसे विश्व उष्णन कहते हैं।
  • पृथ्वी के ताप में केवल 0.5° C जितनी कम वृद्धि के इतने गंभीर परिणाम हो सकते है।
  • हिमालय के गंगोत्री हिमनद विश्व उष्णन के कारण पिघलने आरंभ हो गए हैं।
  • दिल्ली संसार में सर्वाधिक प्रदूषित नगर है।
  • जल जीवन के लिए आवश्यक है।
  • जल की आवश्यकताएँ :- पीने , नहाने , खाना पकाना , कपड़े धोना आदि।
  • जल कहाँ से प्राप्त करते हैं :- नदियों , झरनों , तालाबों , कुओं अथवा हैडपंप से जल प्राप्त करते हैं।
  • जल :- जल एक महत्वपूर्ण नवीकरणीय प्राकृतिक संसाधन है , भूपृष्ठ का तीन-चौथाई भाग जल से ढका है।
  • लगभग 3.5 अरब वर्ष पहले जीवन , आदि महासागरों में ही प्रारंभ हुआ था।
  • अलवणीय जल 3℅ प्रतिशत ही है। – बर्फ़ के रूप में अंटाकर्टिका , ग्रीनलैंड , नदियों , झीलों , तालाबों , ध्रुवीय बर्फ़ , भौमजल और वायुमंडल में पाया जाता है।
  • जल प्रदूषण :- जब भी वाहित मल , विषैले रसायन , गाद आदि जैसे हानिकारक पदार्थ जल में मिल जाते है जिसे जल प्रदूषण कहते हैं।
  • जल कैसे प्रदूषित होता है।

1. औद्योगिक कूड़ा

2. कृषि क्षेत्र में अनुचित गतिविधियां

3. सामाजिक और धार्मिक रीति-रिवाज, जैसे पानी में शव को बहाने, नहाने, कचरा फेंकने

5. जहाजों से होने वाला तेल का रिसाव

6. एसिड रैन (एसिड की बारिश) गोलबल वार्मिंग के कारण

  • 1985 में नदियों को बचाने के लिए गंगा कार्य परियोजना शुरू हुआ।
  • WWF विश्वव्यापी कोष ने बताया कि संसार के दस नदियों का अस्तित्व खतरे में है।
  • जल संरक्षण :- जल का विवेकपूर्ण उपयोग किया जाए और सावधनी बरतें , जिससे जल व्यर्थ न
  • जल की बचत –
  1. कम उपयोग (Reduce)
  2. पुनः उपयोग (Reuse)
  3. पुनः चक्रण (Recycle)
  4. पुनः प्राप्त करना (Recover)
  5. उपयोग न करना (Refuse)